ईरान युद्ध से बहुध्रुवीय दुनिया का मार्ग हुआ मज़बूत

  • एड. संजय पांडे

पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक समीकरण तेज़ी से बदले हैं। अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त सैन्य आक्रमण का सामना करते हुए ईरान न केवल युद्धभूमि में टिका रहा, बल्कि उसने सामरिक बढ़त भी हासिल कर ली। इस जीत के पीछे ईरान की स्वदेशी सैन्य क्षमता, जनता की एकजुटता और निर्णायक कूटनीति तो थी ही, लेकिन उसे एक मज़बूत आधार-स्तंभ भी प्राप्त हुआ – चीन। “12 दिवसीय युद्ध” और “रमज़ान युद्ध” जैसे ताज़ा संघर्षों में ईरानी जनता और उद्यमियों ने जो सामर्थ्य दिखाया और चीन ने जो आर्थिक, तकनीकी, राजनयिक और मानवीय मदद दी, उससे एक नया शक्ति-संतुलन उदय हुआ है। चीन ने ईरान की वास्तव में क्या मदद की, उपलब्ध जानकारी से चीन ने ईरान क्षेत्र में अपना प्रभाव कैसे बढ़ाया है और इन सबके चलते अमेरिकी वर्चस्व का काल इतिहास में दफ़न होता दिख रहा है।

चीन ने ईरान को रणक्षेत्र से लेकर पुनर्निर्माण तक सभी स्तरों पर मदद पहुँचाई। सबसे पहले, चीन ने ईरान की आर्थिक जीवन-रेखा टूटने नहीं दी। पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण जब कई देश ईरानी तेल खरीदने से डर रहे थे, तब चीन लगातार ईरान का सबसे बड़ा तेल ग्राहक बना रहा। चीन ईरानी और रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, और पाइपलाइन व समुद्री मार्ग से होने वाले इस व्यापार के कारण ईरान के विदेशी मुद्रा स्रोत नहीं सूखे और युद्धकाल में भी अर्थव्यवस्था धराशायी नहीं हुई। इसके साथ ही, युद्धविराम और समझौते के लिए चीन ने अत्यंत सक्रिय राजनयिक समर्थन दिया। पाकिस्तान की मध्यस्थता से अमेरिका के साथ अप्रत्यक्ष वार्ता चल रही थी, तब चीन ने शुरू से ही ईरान के राजनयिक दृष्टिकोण का स्वागत किया।

समझौता घोषित होने के बाद चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने ईरानी समकक्ष अब्बास अराग़ची से दूरभाष पर चर्चा करते हुए ईरान सरकार और जनता की दमन के विरुद्ध दृढ़ता तथा जिम्मेदार राजनयिक दृष्टिकोण की सराहना की। उन्होंने समझौते के सभी प्रावधानों के सटीक और पूर्ण कार्यान्वयन की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए चीन के सहयोग की तत्परता जताई। राजनयिक मोर्चे पर चीन ने रूस के साथ समन्वित भूमिका निभाई। चीन और रूस दोनों ने इस्लामाबाद समझौते का स्वागत किया। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने अमेरिका और इज़राइल द्वारा समझौते के पालन की ज़िम्मेदारी पर बल दिया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के समर्थन सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस समझौते का समर्थन करना चाहिए, इस पर चीन-रूस सहमत हुए। इस राजनयिक मोर्चेबंदी से ईरान को अलग-थलग करने की अमेरिकी कोशिशें विफल रहीं।

युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण काल में भी चीन ने ईरान और लेबनान के साथ खड़े रहने की घोषणा की। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने स्पष्ट किया कि बीजिंग युद्धोपरांत पुनर्निर्माण को उच्च प्राथमिकता देता है और आर्थिक स्थिति व जन-जीवन सुधारने के लिए जल्द ही नई मानवीय सहायता भेजी जाएगी। इसके अलावा, इस्लामाबाद समझौते के तहत 300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण कोष बनाया जाएगा, जिसमें चीन की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। सैन्य-तकनीकी मोर्चे पर भी चीन ने बड़ी मदद दी। हवाई रक्षा, ड्रोन प्रौद्योगिकी, मिसाइल प्रणाली और साइबर क्षमता में गहरे सहयोग से ईरान ने स्वदेशी क्षमता को मज़बूत कर इज़राइल की आयरन डोम प्रणाली को प्रभावी चुनौती दी।

डिजिटल भविष्य के निर्माण के लिए भी चीन ईरान का प्रमुख भागीदार है। हाल ही में हुए ब्रिक्स फ्यूचर नेटवर्क इनोवेशन फोरम 2026 में ईरान ने विश्वसनीय कंप्यूटिंग पावर नेटवर्क (Trusted Computing Power Networks) विकसित करने हेतु सहयोग रूपरेखा प्रस्तावित की और इस पहल का नेतृत्व चीन के उद्योग एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने किया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, औद्योगिक इंटरनेट ऑफ थिंग्स, स्मार्ट लॉजिस्टिक, आधुनिक वित्तीय प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में ईरान अपनी क्षमता बढ़ा रहा है और चीन इसमें प्रमुख तकनीकी भागीदार है।

ईरान में चीन का प्रभाव विस्तार मात्र सरकारी राजनयिक संबंधों तक सीमित न रहकर अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, वित्तीय बुनियादी ढाँचे और डिजिटल भविष्य तक फैला हुआ है। इस्लामाबाद समझौता घोषित होते ही ईरान ने चीन, रूस और ओमान के साथ उच्चस्तरीय राजनयिक समन्वय साधा। विदेश मंत्री अराग़ची ने चीन के वांग यी को समझौते के विवरण की जानकारी देते हुए ईरान-चीन संबंधों की रणनीतिक प्रकृति पर बल दिया और वार्ता के दौरान चीन के समर्थन के लिए आभार जताया। दोनों देशों ने ऊर्जा, व्यापार और निवेश में द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने के अवसरों पर चर्चा की। इसी से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर क़ालीबाफ़ की दूरदृष्टि स्पष्ट होती है। वे स्वयं ईरान के चीन प्रकरण के विशेष प्रतिनिधि हैं और उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “भविष्य में कोई भी प्रादेशिक समूह उदय होगा, तो उसमें चीन और ईरान ये दो निश्चित और अनिवार्य सदस्य होंगे।” उनके अनुसार, “चीन हमारे लिए अद्वितीय है। हमें चीन को विश्वास दिलाना चाहिए कि हम केवल ग्राहक नहीं, बल्कि पूर्ण भागीदार हैं।” यह भूमिका चीन के साथ संबंधों को सामान्य व्यापार से सर्वांगीण रणनीतिक भागीदारी की ओर ले जाने के संकल्प को दर्शाती है।

इसी पृष्ठभूमि में ईरान चेंबर ऑफ कॉमर्स के उपाध्यक्ष ग़ादिर घियाफ़ेह ने रेखांकित किया कि चीन 2035 और 2050 तक कहाँ पहुँचेगा, इसे समझकर ईरान-चीन विकास दस्तावेज़ तैयार करना चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अत्याधुनिक तकनीक, विद्युत वाहन चीन की प्राथमिकताएँ हैं और उसी दिशा में ईरान को अपनी औद्योगिक व व्यापार नीतियाँ बनानी चाहिए। इससे चीन को ईरानी बाज़ार प्राथमिकता का लगेगा और ईरान चीन की मूल्य-शृंखला में अपना स्थान बना लेगा। इस नीति को मूर्त रूप देने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्रों में ‘ईरान-चीन सहयोग विभाग’ स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया। निर्यात बढ़ाने और निवेश आकर्षित करने के लिए ये क्षेत्र सुरक्षित व स्थिर वातावरण देंगे। इसके साथ ही ईरान-चीन संयुक्त निवेश कोष (Joint Investment Fund) बनाने का निर्णय लिया गया, जिससे चीन को दीर्घकालिक पूँजीगत भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी।

इसके अतिरिक्त, ईरान चेंबर के अनुसंधान केंद्र प्रमुख ईसा मंसूरी ने लॉजिस्टिक टाउन खड़ा कर सीमा शुल्क, परिवहन और आर्थिक लेन-देन सुगम करने का प्रस्ताव रखा। चीनी कंपनियाँ वहाँ स्थापित होंगी तो स्थानीय स्तर पर आउटसोर्सिंग होगी और ईरान चीन के लिए पूर्व एशिया में आपूर्ति पुल (Supply Bridge) बनेगा। पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में ईरान-चीन के साथ तुर्की, पाकिस्तान या क़तर जैसे तीसरे देश को शामिल कर नेटवर्क खड़ा करना चाहिए, जिससे ईरान व्यापारिक-औद्योगिक केंद्र बने, ऐसा भी सुझाव दिया गया। बुनियादी ढाँचे के मोर्चे पर चाबहार बंदरगाह और मकरान तेल शोधन परियोजना दो महत्वाकांक्षी परियोजनाएँ हैं। खान एवं खनिज आयोग ने 37 परियोजनाएँ चिह्नित कीं, जिनमें चाबहार बंदरगाह का निर्यात केंद्र के रूप में विकास, दुर्लभ खनिजों की खोज, गहन खनन और 25,000 खनन मशीनों की आपूर्ति ये चार परियोजनाएँ महत्वपूर्ण हैं।

चीन ने चाबहार में निवेश किया तो ईरान पश्चिम एशिया और यूरेशिया का व्यापारिक केंद्र बन जाएगा। इसके अलावा, मकरान तटरेखा पर चीन को तेल शोधन संयंत्र लगाने देने का प्रस्ताव रखा गया, जहाँ ईरान कच्चा तेल देगा और चीन प्रसंस्कृत उत्पादों की स्वयं ढुलाई करेगा; इससे चीन को ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी मिलेगी और ईरान कच्चे माल के बजाय मूल्यवर्धित उत्पादों का निर्यातक बनेगा। प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और संस्थागत निर्माण पर भी उतनी ही गंभीरता से ध्यान दिया जा रहा है। उद्योग आयोग ने ज़ोर देकर कहा कि सरकारी नीति स्थिर हो, क़ानूनों का सम्मान हो और शांति रहे, तो देशी निवेशक पुर्जे आयात करने के बजाय प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए तैयार हैं। चीन के साथ संबंधों को अब केवल वित्तपोषण तक सीमित न रखकर रणनीतिक स्तर पर ले जाने के लिए ‘एकीकृत कमान’ बनाने की माँग की गई, ताकि समानांतर संस्थाएँ उत्पन्न न हों और केंद्रीकृत नीति-निर्माण हो सके। डिजिटल क्षेत्र में तो ईरान ने ब्रिक्स के मंच पर सक्रिय नेतृत्व दिखाया। ब्रिक्स फ्यूचर नेटवर्क इनोवेशन फोरम में ईरान ने भविष्य की डिजिटल बुनियादी संरचना, विश्वसनीय कंप्यूटिंग पावर नेटवर्क और सीमापार औद्योगिक सहयोग के लिए प्रस्ताव रखे और स्वयं को एक क्षेत्रीय प्रौद्योगिकी भागीदार के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।

यह सहयोग केवल विचारों के आदान-प्रदान तक न रहकर प्रत्यक्ष संयुक्त परियोजनाओं, परीक्षण मंचों और औद्योगिक अनुप्रयोगों तक ले जाने का उद्देश्य है। इन सबको क़ालीबाफ़ के निर्णायक वक्तव्य ने राजनीतिक बल दिया। उन्होंने कहा, “अब हमें मिसाइल दाग़ने वाले नौजवानों के हाथों से मोर्चा अपने हाथ में लेकर जनता को आर्थिक दबाव से बाहर निकालना चाहिए और समृद्धि लानी चाहिए।” उन्होंने चीन के साथ आर्थिक सहयोग के लिए वित्तीय प्रणाली, लॉजिस्टिक, परिवहन और बुनियादी ढाँचे में मूलभूत सुधारों की आवश्यकता रेखांकित की। “हमें शिक्षा से लेकर बाज़ार और आपूर्ति शृंखला तक चीन के साथ एक साझा पारिस्थितिकी तंत्र में जुड़ना चाहिए,” उनका यह वाक्य सहयोग की गहराई दर्शाता है। प्रतिबंधों को ‘कागज़ का टुकड़ा’ कहने वाले प्रबंधक न होने की बात कहते हुए वे आगे बोले, “अगर प्रतिबंध हटाने का अर्थ आत्मसमर्पण है, तो हम ऐसा कभी नहीं करेंगे; ईरानी जनता जान देगी लेकिन झुकेगी नहीं।” इसी के साथ इस्लामाबाद समझौते के बाद ईरान ने ओमान के साथ समुद्री सुरक्षा पर समन्वय बढ़ाया। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात का सुरक्षित व अबाध मार्ग सुनिश्चित करने की वचनबद्धता दोनों देशों ने जताई। यह जलडमरूमध्य वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम है और चीन की ऊर्जा सुरक्षा को भी मज़बूत करता है।

इन सब घटनाक्रमों से अमेरिका के एकध्रुवीय वर्चस्व का भविष्य क्या होगा, यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है। ईरान-चीन-रूस की यह नई रणनीतिक त्रिकोणीय गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व के अस्त होने का एक प्रबल संकेत है। सबसे पहले, डॉलर का हथियार अब पहले जैसा प्रभावी नहीं रहा। अमेरिका ने डॉलर का उपयोग आर्थिक शस्त्र के रूप में कर कई देशों को कठघरे में रखा था; लेकिन चीन-ईरान व्यापार युआन-रियाल में होने लगा और ब्रिक्स में वैकल्पिक मुद्रा प्रणाली पर चर्चा शुरू होने से डॉलर की पकड़ ढीली पड़ रही है।

इस्लामाबाद समझौते में अमेरिका को ईरान की जब्त संपत्ति छोड़ने और बंदरगाहों की नाकेबंदी ख़त्म करने का प्रावधान मानना पड़ा, यह एक तरह से पीछे हटना ही है। दूसरी ओर, शंघाई सहयोग संगठन, ब्रिक्स, बेल्ट एंड रोड जैसी अमेरिका के नाटो और जी-7 के विकल्प बनी बहुध्रुवीय संस्थाएँ मज़बूत हो रही हैं। ईरान इन सभी संगठनों का सक्रिय सदस्य बन गया है और ब्रिक्स फ्यूचर नेटवर्क फोरम में उसने चीन के नेतृत्व में डिजिटल बुनियादी ढाँचे की रूपरेखा तैयार करना, यह अमेरिकी प्रौद्योगिकी वर्चस्व को सीधी चुनौती है।

सैन्य मोर्चे पर भी अमेरिकी अपराजेयता का भ्रम टूट गया है। ईरान ने ड्रोन और मिसाइल हमलों द्वारा इज़राइल की हवाई रक्षा प्रणाली को भेदा, तब अमेरिकी हथियारों पर खड़ी इज़राइल की अभेद्यता का दबदबा ढह गया। पश्चिम की तकनीक अंतिम नहीं है, यह चीन के सहयोग से सिद्ध हुआ। युद्धविराम समझौते में अमेरिका को इज़राइल को लेबनान पर हमले रोकने के लिए बाध्य करने की ईरानी शर्त माननी पड़ी, यह अमेरिकी कूटनीति की सीमाएँ दर्शाता है।

आर्थिक और तकनीकी केंद्र भी अब स्थानांतरित हो रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादन केंद्र चीन है और एआई, विद्युत वाहन, क्वांटम प्रौद्योगिकी में चीन ने बढ़त ले ली है। ईरान जैसे देश अब पूँजी, प्रौद्योगिकी और भविष्य के रोज़गार के लिए अमेरिका की नहीं, बल्कि चीन की ओर देख रहे हैं। जैसा कि लेखों से दिखा, ईरान स्वयं को चीन की मूल्य-शृंखला में बैठाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर ब्रिक्स प्लस के माध्यम से डिजिटल भविष्य की रूपरेखा बना रहा है। यह अमेरिका के वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र में होने की स्थिति को बड़ी चुनौती है।

इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात है वैश्विक दक्षिण गोलार्ध की बढ़ती आवाज़। चीन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि संयुक्त राष्ट्र में उभरती बाज़ार अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है और वैश्विक दक्षिण की आवाज़ अधिक सुनी जानी चाहिए। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने वैश्विक प्रशासन को अधिक न्यायपूर्ण व संतुलित बनाने के लिए श्वेतपत्र जारी करते हुए कहा, “छोटा हो या बड़ा, सभी देश अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समान सदस्य हैं।” ईरान-चीन भागीदारी इस बदलती वैश्विक व्यवस्था का एक मूर्त आधार-स्तंभ है।

अमेरिकी एकध्रुवीय शासन को नकार कर बहुध्रुवीय, नियम-आधारित किंतु पश्चिम के एकाधिकार से मुक्त वैश्विक व्यवस्था की नींव रखी जा रही है। हालाँकि, अमेरिकी वर्चस्व एक रात में पूरी तरह इतिहास नहीं बन जाएगा। अमेरिका के पास अभी भी विशाल सैन्य ठिकाने, तकनीकी क्षमता और आरक्षित मुद्रा के रूप में डॉलर का स्थान है। लेकिन एकध्रुवीय दुनिया का दौर निश्चित रूप से समाप्त हो रहा है और अनेक ध्रुवों वाली एक नई व्यवस्था उदय ले रही है, यह इन घटनाक्रमों से सिद्ध होता है। स्वयं अमेरिका को भी अब पाकिस्तान की मध्यस्थता से समझौता करना पड़ता है और युद्धविराम के बाद 60 दिनों में सर्वसमावेशी अंतिम समाधान निकालने की प्रतिबद्धता देनी पड़ती है, यह सच्चाई अमेरिकी वर्चस्व की सापेक्षिक गिरावट का स्पष्ट संकेत है।

अंततः, ईरान को अमेरिका-इज़राइल के विरुद्ध युद्ध में मिली बढ़त और उसके बाद इस्लामाबाद समझौते के ज़रिए हासिल किया गया राजनयिक लाभ, चीन के दृढ़ और बहुआयामी समर्थन के बिना संभव नहीं था। चीन ने आर्थिक जीवन-रेखा, राजनयिक संरक्षण, तकनीकी सहयोग, युद्धोत्तर पुनर्निर्माण की गारंटी और ब्रिक्स जैसे मंचों पर साझा डिजिटल भविष्य की रूपरेखा बनाकर ईरान को एक सर्वांगीण रणनीतिक भागीदार बनाया है। क़ालीबाफ़ के शब्दों में कहें तो, “चीन और ईरान किसी भी भावी प्रादेशिक समूह के निश्चित और अनिवार्य सदस्य” बन गए हैं। भले ही अमेरिकी वर्चस्व अभी पूरी तरह इतिहास न बना हो, किंतु ईरान-चीन-रूस का यह नया रणनीतिक गठबंधन, वैश्विक दक्षिण गोलार्ध की बढ़ती आवाज़ और बहुध्रुवीय संस्थाओं का सशक्तिकरण, उस वर्चस्व की नींव खोद रहे हैं, यह निर्विवाद है।

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