संस्कारो का प्रतीक है भारतीय संस्कृति : आनंदमूर्ति गुरूमां

ज्ञान, भक्ति, योग की अमृतवर्षा समागम का दूसरा दिन

फरीदाबाद : भारतीय संस्कृति संस्कारों का प्रतीक है। भारत की तपोभूमि त्याग, बलिदान, धैर्य और धर्म पर चलने वाली है, क्योंकि हम अपने पूर्वजो के संस्कारों को लेकर चलते हैं। यह बात एनआईटी स्थित दशहरा ग्राउंड में ऋषि चैतन्य विजन फरीदाबाद द्वारा आयोजित चार दिवसीय ज्ञान, भक्ति, योग की अमृतवर्षा समागम के दूसरे दिन परमपूज्य आनंदमूर्ति गुरूमां ने विशाल पांडाल को संबोधित करते हुए कही। यह समागम शनिवार और रविवार को भी जारी रहेगा।

उन्होंने कहा कि संतो के विचार और सत्संग श्रवण से बच्चों में आचार-विचार, आहार-विहार में परिवर्तन आता है। इसलिए हमें अपनी पीढ़ी के भविष्य को सुधारने के लिए सत्संग और समागमों में संतों के प्रवचनों को श्रवण करवाना चाहिए। भौतिकता के इस युग में वर्तमान पीढ़ी अपने नैतिक संस्कारों को खोती जा रही है। बुजुर्गों के मान सम्मान, माता-पिता के आदर में कमी आने लगी है, इसलिए आज युवा पीढ़ी को नैतिक शिक्षा की बहुत जरूरत है। उन्होंने कहा कि धन से सभी सुख प्राप्त नहीं होते जो सुख ईश्वर की भक्ति से प्राप्त होता है वह धन से नहीं मिल सकता। इतिहास गवाह है सिद्धार्थ गौतम ने धन को त्याग वैराग्य लिया, हरीशचंद्र ने भी सपने में ऋषि को दान देने की बात कहकर राजपाठ छोड़ दिया। वहीं प्रभु राम ने राजतिलक को छोडक़र वनवास की ओर कूच किया और भ्राता लक्ष्मण को समझाया कि इस वनवास में हमें ऋषि-मुनियों का ज्ञान और आशीर्वाद मिलेगा जोकि राजपाठ काल में संभव नहीं है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य बन जाता है कि वे अपने बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कारों से भी प्रेरित करें ताकि वे हमारी संस्कृति और भारतीय पृष्ठभूमि को जान सके।

आनंदमूर्ति गुरूमां ने कहा कि जीवन में नम्रता, प्यार, भाईचारा, सहयोग लाने की आवश्यकता है ताकि हम दुख की घडी में किसी के काम आ सके। आज लोग दिखावा ज्यादा कर रहे हैं। इसका परहेज किया जाना चाहिए, क्योंकि परमात्मा उन लोगों से ही ज्यादा खुश होते हैं जो दूसरों के सुख-दुख में ज्यादा सहयोग करते हैं। व्यक्ति को जीवन में सुख और दुख में ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। क्योंकि परमात्मा जब सुख देता है तो दुख रूपी परीक्षा भी लेता है इसमें धैर्य खोने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कुछ दुख भी अच्छे होते हैं। उन दुखों से सीख मिलती है और उस सीख से व्यक्ति संभलकर फिर जीवन की नई राह पर चल निकलता है। संसार में विलासता की वस्तुओं को एकत्र करने से कोई फायदा नहीं है जब तक हम ईश्वर में अपना मन और तन दोनों नहीं लगाते तब तक हमारा जीवन सफल सार्थक नहीं हो सकता। इससे पूर्व नगर निगम की महापौर प्रवीण बत्रा जोशी, संदीप जोशी और ऋषि चैतन्य विजन फरीदाबाद के सेवादारों ने गुरूमां का गुलदस्ता भेंट कर स्वागत किया।

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