मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स फरीदाबाद से वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. निखिल सेठ ने बताया; ग्लूकोमा ‘साइलेंट किलर ऑफ़ विज़न’ कहलाता है

फरीदाबाद : मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स फरीदाबाद से वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. निखिल सेठ ने बताया कि नेत्र रोग विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लूकोमा ‘साइलेंट किलर ऑफ़ विज़न’ कहलाता है। ओपीडी में हर महीने 60 से अधिक मरीज ग्लूकोमा के आते हैं। यह जिन्दगी भर की बीमारी है तो बाकी मरीजों का नियमित रूप से फॉलोअप चलता रहता है। यह बीमारी 100 में से 80 लोगों में लक्षण नही देती है और समय के साथ धीरे-धीरे आंख की नस को सुखा देती है। आमतौर पर यह बीमारी 35-40 साल की उम्र में शुरू होती है और समय रहते इलाज न कराने पर 70-80 उम्र तक आते-आते मरीज को पूर्ण रूप से अँधा बना देती है। 70-80 साल की उम्र में चेकअप कराने पर पता चलता है कि यह बीमारी अंतिम चरण में पहुँच जाती है और उस समय कोई इलाज काम नही करता है। इस बीमारी का शिकार वे लोग ज्यादा होते हैं जिनके परिवार में इस बीमारी से पीड़ित कोई व्यक्ति है, डायबिटीज हैं या चश्में का नम्बर बार-बार बदल रहा है।

इसलिए सलाह दी जाती है कि 35 वर्ष से अधिक उम्र के हर व्यक्ति को स्क्रीनिंग करानी चाहिए। साल में एक बार आंख का प्रेशर जरूर चेक कराना चाहिए। अगर प्रेशर 18 से ज्यादा पाया जाता है तो आंख सर्जन स्वयं ही आपको इस बढे हुए प्रेशर के बारे बताएगा या आप खुद भी इसके बारे में जरूर पता करें। जिन लोगों की फैमिली हिस्ट्री में ग्लूकोमा है उन्हें योग में शीर्षासन करने से बचना चाहिए क्योंकि इस आसन से कुछ घंटों के लिए आंख का प्रेशर तेजी से बढ़ता है। 35 वर्ष से अधिक उम्र के बाद आंख में हल्का दर्द होने, दर्द के दौरान आंख में थोडा धुंधलापन आए, रोशनी के चारों ओर रंगीन छल्ले दिखाई देने या हर 6 महीने में चश्में का नम्बर बदलने लगे तो ग्लूकोमा का टेस्ट कराएँ। अगर इस बीमारी का शुरूआती चरण में ही पता चल जाए तो इसका इलाज अच्छे से किया जा सकता है और व्यक्ति लम्बे समय तक अच्छी दृष्टि के साथ जीवन व्यतीत कर सकता है।

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