दूसरे दिन संतश्री वैष्वकर्मण धर्माधिकारी जी ने ईलाचल तीर्थ महिमा, वास्तुदेव कथा के बारे में बताया
कथा स्थल पर महिलाओं को एक पुस्तक भी भेंट की गई जिसमें ब्राह्मणों के बारे में बताया गया है।

फरीदाबाद, 30 मई। पांच दिवसीय वैदिक व्यापार सुत्र – श्रीमद् विश्वकर्मा महापुराण कथा के दूसरे दिन कथा प्रवक्ता संतश्री वैष्वकर्मण धर्माधिकारी, विश्वधारण समर्थ सद्गुरु महाराज जी ने ईलाचल तीर्थ महिमा, वास्तुदेव कथा के बारे में बताया। महाराज जी ने कहा कि भगवान विश्वकर्मा को वास्तुकार के रूप में पूजा जाता है। कहते हैं इनकी पूजा से व्यक्ति के अंदर शिल्पकला का विकास होता है। सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा की सातवीं संतान भगवान विश्वकर्मा को माना जाता है। कुछ धर्म ग्रंथों में भगवान विश्वकर्मा को महादेव का अवतार बताया गया है। मान्यता के अनुसार, विश्वकर्मा जी ने भगवान श्रीकृष्ण के लिए द्वारका नगरी का निर्माण किया था। वहीं, सोने की लंका भी बनाई थी। भगवान विश्वकर्मा को स्वर्ग लोक, पुष्पक विमान, कुबेरपुरी जैसे सभी देवनगरी का रचनाकार कहा जाता है।

संतश्री वैष्वकर्मण धर्माधिकारी जी ने कहा कि वास्तुदेव, जिन्हें वास्तु पुरुष या वास्तोष्पति भी कहा जाता है, भारतीय वास्तुशास्त्र में एक महत्वपूर्ण देवता हैं। उन्हें भूमि का देवता माना जाता है और मान्यता है कि वे किसी भी भवन के निर्माण से पहले पूजा करने योग्य हैं। वास्तुदेव की उत्पत्ति के बारे में कई कथाएं हैं। एक कथा के अनुसार, जब भगवान शिव और अंधकासुर नामक राक्षस के बीच युद्ध हुआ, तब शिव के पसीने से वास्तुदेव की उत्पत्ति हुई। दूसरी कथा के अनुसार, भगवान शिव के पसीने की बूंदें धरती पर गिरीं और उनसे एक विशाल पुरुष प्रकट हुआ, जो बाद में वास्तुदेव के रूप में जाना गया। वास्तुशास्त्र में किसी भी भवन के निर्माण से पहले वास्तुदेव की पूजा करने का विधान बताया गया है।

वहीं कथा स्थल पर महिलाओं को एक पुस्तक भी भेंट की गई जिसमें ब्राह्मणों के बारे में बताया गया है।
दूसरे दिन की कथा में दयानन्द वत्स सेक्टर-23, रमेश पांचाल बल्लभगढ़, सतबीर पांचाल जाजरू, अशोक प्रधान, अतर सिंह पांचाल, रामकिशन पांचाल, जितेन्द्र पांचाल, राजू यधुवंशी, बंटी पांचाल, खिल्लन पांचाल, ललित वत्स, पवन पांचाल, योगेश पांचाल, विकास पांचाल, अमित पांचाल, तरूण पांचाल, मोनिका पांचाल आदि मौजूद रहे।



