एनकाउंटर से उठते सवाल ! कई राज छिपाने के लिए तो नहीं हुआ एनकाउंटर !

कानपुर। विकास दुबे के पांच गुर्गों का एनकाउंटर हो चुका था। विकास दुबे का भी एनकाउंटर तय था, लेकिन वह खुद सरेंडर करने उज्जैन आ गया। शुक्रवार सुबह कानपुर से महज 17 किमी दूर उसका एनकाउंटर कर दिया गया। जैसे विकास दुबे की गिरफ्तारी से सवाल उठ रहे थे, इसी तरह इस एनकाउंटर से भी सवाल खड़े हो रहे हैं !

चर्चा थी कि विकास को प्लेन के जरिए उज्जैन से इंदौर और फिर वहां से यूपी ले जाया जाएगा, लेकिन अचानक कहा गया कि उसे सडक़ के रास्ते ले जाया जाएगा और इसके लिए यूपी एसटीएफ की टीम आ रही है। लेकिन एसटीएफ की टीम आई ही नहीं। शाम को उज्जैन से एमपी पुलिस की टीम विकास को झांसी तक ले गई। वहीं पुलिस के काफिले में कई गाडिय़ां थीं, एक्सीडेंट सिर्फ उसी गाड़ी का क्यों हुआ जिसमें विकास सवार था ! विकास को जब झांसी में एमपी पुलिस ने यूपी पुलिस के हवाले किया, तब वहां 10 से ज्यादा गाडिय़ां तैयार थीं। इसमें से एक गाड़ी में विकास को बैठाया गया। बाकी गाडिय़ां आगे-पीछे थीं। मीडिया भी इस काफिले का पीछा कर रहा था। भारी बारिश हो रही थी। इस पूरे काफिले में एक्सीडेंट सिर्फ विकास की गाड़ी का हुआ। पुलिस की बाकी किसी गाड़ी या मीडिया की किसी गाड़ी के साथ हादसा नहीं हुआ।

आरोप है कि काफिले के साथ चल रही मीडिया की गाडिय़ों को रोकने के लिए बीच में अचानक चेक पोस्ट लगा दी गई। इस वजह से मीडिया की गाडिय़ां पीछे छूट गईं। बाद में खबर आई कि विकास दुबे जिस गाड़ी में था, वह पलट गई और उसका एनकाउंटर हो गया। एनकाउंटर के बाद मौके पर पहुंचे पुलिस के आला अफसरों ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया कि क्या मीडिया को रोकने के लिए ही अचानक चेकिंग शुरू की गई थी !

यह भी बड़ा सवाल है कि जिस पर 60 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हों, जो 8 पुलिसवालों की हत्या का आरोपी हो, उसे गाड़ी में क्या हथकड़ी पहनाकर नहीं बैठाया गया था? क्योंकि यह कहा गया है कि एक्सीडेंट के तुरंत बाद विकास ने पिस्टल छीन ली और कुछ गोलियां चलाईं। पुलिस तो चाहती कि वह सरेंडर कर दे, लेकिन जब वह नहीं माना तो जवाबी फायरिंग में मारा गया। इन पर पुलिस के अफसर कहते रहे कि सब बताएंगे, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में।

इस बारे में पूछे जाने पर यूपी के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने बताया था कि विकास से पूछताछ की जाए तो बड़े-बड़े लोगों के नाम सामने आएंगे। इसमें आईएएस, आईपीएस, नेताओं के नाम सामने आ सकते हैं। विकास का उज्जैन में पकड़ा जाना समझ से बाहर है।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दिलचस्प ट्वीट किया। उन्होंने लिखा- दरअसल कार नहीं पलटी है, राज खुलने से सरकार पलटने से बचाई गई है।

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा- जिसका शक था, वही हो गया। विकास दुबे का किन-किन राजनीतिक लोगों, पुलिस अधिकारियों से संपर्क था, अब यह उजागर नहीं हो पाएगा। सभी एनकाउंटर का पैटर्न एक समान क्यों है?

सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में पुलिस एनकाउंटरों के संबंध में दिशा-निर्देश जारी किए थे। हर एनकाउंटर की जांच जरूरी है। जांच खत्म होने तक इसमें शामिल पुलिसकर्मियों को प्रमोशन या वीरता पुरस्कार नहीं मिलता। एनकाउंटर आमतौर पर दो तरह के होते हैं। पहला, जिसमें कोई अपराधी पुलिस की हिरासत से भागने की कोशिश करता है। दूसरा, जब पुलिस किसी अपराधी को पकडऩे जाती है और वो जवाबी हमला कर देता है। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार, सीआरपीसी की धारा 176 के तहत हर एनकाउंटर की मजिस्ट्रेट जांच जरूरी है। पुलिस को हर मुठभेड़ के बाद इस्तेमाल किए गए हथियार और गोलियों का हिसाब देना होता है। पुलिस को एनकाउंटर का अधिकार नहीं है। सिर्फ खुद की हिफाजत का अधिकार है। अपराधी से खुद की जान बचाने के लिए पुलिसकर्मी गोली चलाता है और उसमें कोई अपराधी मारा जाता है तो इसे साबित करना भी जरूरी है।

विकास दुबे 4 राज्यों से गुजरते हुए 1250 किमी का सफर तय कर उज्जैन कैसे पहुंचा था, यह सस्पेंस बना हुआ है। उज्जैन में उसकी गिरफ्तारी पर भी सवाल उठे। एक दिन पहले यानी बुधवार दोपहर को उज्जैन के महाकाल थाना प्रभारी और चौकी प्रभारी का तबादला हुआ। रात को कलेक्टर आशीष सिंह और एसपी मनोज सिंह महाकाल मंदिर पहुंचे थे। दोनों का दावा है कि वे एक बैठक के सिलसिले में गए थे। यहां पुलिस की गांधीगिरी दिखाई दी। विकास खुद ही मंदिर से बाहर आया, पुलिसवाले पीछे चलते रहे। मीडिया आया, तब उसे गर्दन पकडक़र दबोचा गया। किसी पुलिसवाले के हाथ में डंडा तक नहीं था। मंदिर के अंदर विकास के फोटो-वीडियो कौन बनाता रहा, ये कोई नहीं जानता। जब विकास को पकड़ा गया तो एक पुलिसवाले को बोलते सुना गया कि शर्माजी मरवाओगे। विकास भी पीछे मुडक़र बार-बार देखता रहा। जैसे किसी को खोज रहा हो।

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