हिन्दी साहित्य के कोहिनूर मुंशी प्रेमचंद को नमन किया

फरीदाबाद ! राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय एन एच तीन फरीदाबाद की सैंट जॉन एम्बुलेंस ब्रिगेड, जूनियर रेडक्रॉस तथा गाइडस ने मिलकर प्राचार्य रविन्द्र कुमार मनचन्दा के निर्देशानसार महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती पर वर्चुअल कार्यक्रम आयोजित कर श्रद्धासुमन अर्पित किए। ब्रिगेड तथा जूनियर रेडक्रॉस प्रभारी व प्राचार्य रविन्द्र कुमार मनचन्दा ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार व विचारक थे। उनकी रचनाओं में समाजसुधार आंदोलनों, स्वाधीनता संग्राम तथा प्रगतिवादी आंदोलनों के सामाजिक प्रभावों का स्पष्ट चित्रण है। उनमें दहेज, अनमेल विवाह, पराधीनता, लगान, छूआछूत, जाति भेद, विधवा विवाह, आधुनिकता, स्त्री-पुरुष समानता, आदि उस दौर की सभी प्रमुख समस्याओं का चित्रण मिलता है।

प्रधानाचार्य रविन्द्र कुमार मनचन्दा ने बताया कि वे आर्य समाज से प्रभावित रहे जो उस समय का बहुत बड़ा धार्मिक और सामाजिक आंदोलन था। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन किया और 1906 में दूसरा विवाह अपनी प्रगतिशील परंपरा के अनुरूप बाल-विधवा शिवरानी देवी से किया। उन्होंने सेवासदन, गबन प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, कर्मभूमि, गोदान आदि लगभग डेढ़ दर्जन उपन्यास तथा कफन, पूस की रात, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा आदि तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनमें से अधिकांश हिंदी तथा उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुईं। उन्होंने अपने दौर की सभी प्रमुख उर्दू और हिंदी पत्रिकाओं जमाना, सरस्वती, माधुरी, मर्यादा, चाँद, सुधा आदि में लिखा। उन्होंने हिंदी समाचार पत्र जागरण तथा साहित्यिक पत्रिका हंस का संपादन और प्रकाशन भी किया। इसके लिए उन्होंने सरस्वती प्रेस खरीदा जो बाद में हानि में रहा और बंद करना पड़ा। प्रेमचंद फिल्मों की पटकथा लिखने मुंबई आए और लगभग तीन वर्ष तक रहे। उनका साहित्य का उद्देश्य अंतिम व्याख्यान, कफन अंतिम कहानी, गोदान अंतिम पूर्ण उपन्यास तथा मंगलसूत्र अंतिम अपूर्ण उपन्यास माना जाता है। प्राचार्य रविन्द्र कुमार मनचन्दा ने कहा कि प्रेमचंद के उपन्‍यास न केवल हिन्‍दी उपन्‍यास साहित्‍य में बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्‍य में मील के पत्‍थर हैं।

प्रेमचंद एक संवेदनशील कथाकार ही नहीं, सजग नागरिक व संपादक भी थे। मनचन्दा ने बताया कि प्रेमचंद के नाम के साथ मुंशी विशेषण जुड़ने का प्रामाणिक कारण यह रहा कि ‘हंस’ नामक पत्र प्रेमचंद एवं कन्हैयालाल मुंशी के सह संपादन में निकलता था। जिसकी कुछ प्रतियों पर कन्हैयालाल मुंशी का पूरा नाम न छपकर मात्र ‘मुंशी’ छपा रहता था परन्तु कालांतर में पाठकों ने ‘मुंशी’ तथा ‘प्रेमचंद’ को एक समझ लिया और ‘प्रेमचंद’- ‘मुंशी प्रेमचंद’ बन गए। यह स्वाभाविक भी है। सामान्य पाठक प्राय: लेखक की कृतियों को पढ़ता है, नाम की सूक्ष्मता को नहीं देखा करता। आज विद्यालय की ब्रिगेड, जे आर सी और गाइड सदस्यों कोमल, काजल, सपना, भूमिका, खुशी, निशा और पूजा ने मुंशी प्रेमचंद के  भारतीय साहित्य में अमूल्य योगदान को निबंध और पोस्टर द्वारा व्यक्त किया। प्राध्यापिका कविता, जसनीत कौर तथा रविन्द्र कुमार मनचन्दा ने सुंदर अभिव्यक्ति के लिए सभी का स्वागत किया।

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