मीडिया विभाग द्वारा ‘युवा और उभरता भारत: ट्रेंड से ट्रेडिशन तक’ विषय पर युवा संवाद एवं भाषण प्रतियोगिता का आयोजन
भारतीय संस्कृति को आत्मसात कर विकसित भारत में अपनी भूमिका निभाएं युवा: डॉ.देव प्रसाद भारद्वाज

- ट्रेंड एक क्षणिक प्रचलन है,जबकि परंपरा जीवन और समाज को स्थिरता और पहचान देती है : प्रो.अजय रंगा
- सकारात्मक ट्रेंड स्थापित करना युवाओं की नैतिक जिम्मेदारी: प्रो.पवन सिंह
फरीदाबाद। जे.सी.बोस विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, वाईएमसीए के संचार एवं मीडिया प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा “युवा और उभरता भारत: ट्रेंड से ट्रेडिशन तक” विषय पर युवा संवाद एवं भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। स्टूडियो में आयोजित इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो.अजय रंगा, विद्या भारती, हरियाणा के अध्यक्ष डॉ.देव प्रसाद भारद्वाज,मीडिया विभागाध्यक्ष प्रो.पवन सिंह की गरिमामयी उपस्थिति रही।
मुख्य अतिथि डॉ.देव प्रसाद भारद्वाज ने युवाओं से भारतीय संस्कृति, मूल्यों और राष्ट्रीय चेतना को आत्मसात करने का आह्वान करते हुए कहा कि आधुनिकता और परंपरा का संतुलन ही विकसित भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग के महत्व को समझाते हुए विद्यार्थियों से कहा कि रिपोर्टिंग करते समय पत्रकारों को अपनी पूर्वधारणाओं से परहेज करना चाहिए और सामाजिक मूल्यों को सर्वोपरि रखना चाहिए। डॉ. भारद्वाज ने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि कोई भी ‘ट्रेंड’ 6 महीने से ज्यादा नहीं टिकता, लेकिन संस्कृति और परंपराएं हमेशा साथ रहती हैं। पत्रकारिता या किसी भी अन्य फील्ड में आगे बढ़ने के लिए आपके संस्कार और मूल्य ही आपके सबसे बड़े मददगार बनते हैं।
विश्वविद्यालय कुलसचिव प्रो.अजय रंगा ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा, क्या कहना है, कहाँ कहना है और कब कहना है- यही एक सच्ची कला है। ट्रेंड एक प्रचलन है, जो समय के साथ बदल जाता है, जबकि परंपरा जीवन का ऐसा सूत्र है जो समाज को स्थिरता और पहचान देता है। ट्रेंड हमारे जीवन को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए युवाओं को विवेकपूर्ण निर्णय लेने चाहिए।
विभागाध्यक्ष प्रो.पवन सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि युवाओं की नैतिक जिम्मेदारी केवल नए ट्रेंड अपनाना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता को समझते हुए सकारात्मक ट्रेंड स्थापित करना भी है। ट्रेंड समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन परंपराएं भारत की मजबूत नींव हैं। उन्होंने भारतीय सिनेमा का उदाहरण देते हुए जय संतोषी मां, कांतारा, बाहुबली, छावा और महावतार नरसिम्हा और हनुमान अंश जैसी फिल्मों का उल्लेख किया और कहा कि भारतीय संस्कृति से जुड़ी कहानियां आज भी लोगों के दिलों को छूती हैं।
कार्यक्रम की निर्णायक मंडली में प्रो.दीपांश शर्मा, सहायक प्रोफेसर डॉ.सोनिया हुड्डा और डॉ. अखिलेश त्रिपाठी ने विशेष भूमिका निभाई।विजेता प्रतिभागियों के पुरस्कारों की घोषणा डॉ.सोनिया हुड्डा ने की।



