इस्कॉन फरीदाबाद ने दुनिया भर के अन्य सभी इस्कॉन मंदिरों के साथ श्रील ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद जी का प्राकट्य दिवस मनाया

फरीदाबाद : इस्कॉन फरीदाबाद ने दुनिया भर के अन्य सभी इस्कॉन मंदिरों के साथ श्रील ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद जी का प्राकट्य दिवस मनाया। उनका जन्म 1 सितंबर 1896 को कलकत्ता में अभय चरण के रूप में हुआ था। वह ऐसे आचार्य थे जिन्होंने अकेले ही कृष्ण की भक्ति को पूरी दुनिया में फैलाया। उन्होंने कृष्ण और अपने गुरु की आंतरिक इच्छाओं को पूरी तरह से समझा कि वे चाहते हैं कि सभी मनुष्य भक्ति योग की विधि के माध्यम से भगवान के करीब आएं। इस मिशन को अपने में संजोकर वे 1965 में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका गए। जब उनकी उम्र लगभग 70 वर्ष थी और उनकी जेब में सिर्फ 40 रुपये थे।

जुलाई 1966 में उन्होंने ‘अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ’ की स्थापना की। अगले 11 वर्षों की अवधि के भीतर उन्होंने कई बार पूरी दुनिया की यात्रा की और कई देशों में 108 मंदिरों का निर्माण किया। उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि लोगों को कृष्ण के साथ उनके शाश्वत संबंध के बारे में पता चले। इन मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण और भक्ति योग के बारे में एक व्यवस्थित ज्ञान प्रदान किया जाता है। उनकी अन्य उपलब्धियों में श्रीमद्भागवतम और भगवद्गीता का अंग्रेजी में अनुवाद शामिल है और इन महान शास्त्रों पर आधारित पुस्तकों को छापना जो बहुत ही व्यवस्थित और सरल तरीके से कृष्ण के साथ हमारे संबंध और उन्हें प्राप्त करने की विधि को प्रकट करते हैं।
उन्होंने मानव समाज का उद्धार व पूरी दुनिया में शांति और सद्भाव लाने के लिए कम या बिना नींद के अथक परिश्रम किया। यह उनके अथक प्रयासों के कारण ही है कि रूस, चीन जैसे देशों में भी लाखों भक्तों के साथ इस्कॉन के दुनिया भर में लगभग 850 मंदिर हैं। उनकी छवि के साथ भारत सरकार ने 125 का एक सिक्का जारी कर उनके कार्यों के लिए उन्हें सम्मान व मान्यता दी। उन्होंने वर्ष 1977 में अपने भौतिक शरीर को त्याग कर दिव्य धाम में प्रवेश किया। उनकी विरासत उनके दिव्य ज्ञान व पुस्तकों को उनके अनुयायियों द्वारा आज भी विश्व भर में प्रचारित व प्रसारित किया जा रहा है। जिसे इस्कॉन शासी निकाय आयोग द्वारा प्रबंधित किया जाता है।



