ऐतिहासिक धरोहर को नष्ट करना एक बेहद संगीन अपराध

गुरुग्राम/हांसी (मदन लाहौरिया) 4 अगस्त। हरियाणा के एक ऐतिहासिक कस्बे हांसी में लगभग 200 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक धरोहर को वर्तमान भाजपा विधायक विनोद भ्याना व कुछ कांग्रेसी नेताओं की मिलीभगत से तहस नहस करके इस ऐतिहासिक धरोहर ‘मेम का बाग’ नाम की लगभग 21 एकड़ में फैले इस बाग की जमीन को अवैध रूप से कॉलोनी काट कर के प्लाट बेचने का एक महाघोटाला उजागर हुआ है!
हरियाणा के हिसार नगर व हांसी शहर में बहुत से स्थल हैं! सन् 1356 में हिसार नगर तत्कालीन मुगल बादशाह फिरोजशाह तुगलक के द्वारा बसाया गया व हांसी शहर में भी फिरोजशाह तुगलक ने काफी ऐतिहासिक स्थल बनवाये थे! हिसार में फिरोजशाह तुगलक के द्वारा जब गुर्जरी महल का निर्माण करवाया जा रहा था तो उस निर्माण की देखभाल करने के लिए जब भी फिरोजशाह तुगलक दिल्ली से आते थे तो हांसी के किले में ही ठहरते थे क्यों कि वे यहां के सूफी संतों से बहुत प्रभावित थे! इस का कारण था सूफी संत बहलोलशाह जिनको फिरोजशाह तुगलक गुरु की भांति सम्मान करते थे! हांसी में ठहराव के समय फिरोजशाह तुगलक सूफी संत चौथे क़ुतुब हजरत नुरुद्दीन नूर-ए-जहां से धार्मिक सलाह मशवरा भी करते थे!
सन् 1796 में ब्रिटिश सरकार की तरफ से जॉर्ज थॉमस ने हांसी पर पूर्णतया कब्जा कर लिया और जॉर्ज थॉमस ने हांसी को अपने साम्राज्य की राजधानी बनाया व हांसी के किले में सामरिक दृष्टि से कुछ बदलाव किये! वर्तमान में हांसी के किले में जो भवन व इमारत हैं उनमें कुछ मुस्लिम काल के व कुछ जॉर्ज थॉमस के बनवाये हुए हैं!

अब यहां पर चर्चा करते हैं हांसी के मेम के बाग का संबंध ईस्ट इंडिया कंपनी के मिल्ट्री अफसर जेम्स स्कीनर से कैसे कैसे हुआ? जेम्स स्कीनर ने एक स्कीनर हॉर्स रेजिमेंट की स्थापना 23 फरवरी 1803 को की व सन् 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा हांसी की जागीर कॉलोनल जेम्स स्कीनर को दी गई! उसके बाद जेम्स स्कीनर अपना अधिकांश समय हांसी में ही बिताने लगे व ईस्ट इंडिया कंपनी ने यह वर्तमान में चर्चित मेम का बाग नाम से जमीन लगभग 21 एकड़ का बाग जेम्स स्कीनर को उन के रहने के लिए व उन की स्कीनर हॉर्स रेजिमेंट के लिए दे दिया! जेम्स स्कीनर की मृत्यु 4 दिसंबर 1841 को हांसी में इसी जगह पर 64 वर्ष की आयु में हुई! पहले उनका शव यहीं पर दफनाया गया परंतु बाद में दिल्ली में शिफ्ट कर के सेंट जेम्स चर्च में एक मार्बल गुंबद बना कर दफनाया गया! जेम्स स्कीनर का जन्म सन् 1778 में हुआ! उनके पिता लेयुटेनेंट कॉलोनल हरक्यूलस स्कीनर स्कॉटिश थे व उन की माँ हिंदू राजपूत राजघराने से थी! उनके माता पिता से 14 संतान थी! जेम्स स्कीनर की 14 हिंदू व मुस्लिम तथा क्रिश्चियन पत्नियां थी!

जेम्स स्कीनर का आर्मी हैडक्वाटर हरियाणा के हांसी के इसी बाग में था व उनका निवास स्थान भी यहीं था! इसी जगह पर जेम्स स्कीनर अपना दरबार भी लगाते थे व उनकी स्कीनर हॉर्स रेजिमेंट भी यहीं रहती थी! जेम्स स्कीनर की अधिकांश संतानें उन की मृत्यु के बाद ऑस्ट्रेलिया में रहते थे! जब कि उन की एक पत्नी मिसेज स्कीनर हांसी ही रहती थी! जेम्स स्कीनर के एक ग्रेट ग्रेट ग्रैंडसन यानि कि पड़पौते ब्रिगेडियर माइकल स्कीनर अपना अधिकांश समय हांसी ही बिताते थे!
भारत पाकिस्तान बंटवारे के बाद जेम्स स्कीनर की मुस्लिम पत्नियों से पैदा हुई अधिकांश संतानें पाकिस्तान चली गईं व क्रिश्चियन स्कीनर संतानें अधिकांश ब्रिटेन,अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया चली गईं तथा केवल कुछ संतान ही हांसी की ऐतिहासिक धरोहर को संभालने के लिए भारत में रहीं! भारत की आजादी के बाद यह स्किनर्स हॉर्स रेजिमेंट टैंकस की रेजिमेंट में तब्दील की गई व भारतीय सेना की एक सीनियर रेजिमेंट बनी व भारत के राष्ट्रपति की सुरक्षा के तौर पर स्कीनर रेजिमेंट की द्वितीय रेजिमेंट नियुक्त है! सन् 1960 में जेम्स स्कीनर के ग्रेट ग्रेट ले.कर्नल माइकल स्कीनर ने स्किनर्स हॉर्स रेजिमेंट की कमांड संभाल ली थी!
हांसी के इस मेम के बाग की इसी ऐतिहासिकता के कारण 7 जनवरी 2006 को भारतीय सेना के ले.कर्नल ए.के.यादव ने नई दिल्ली स्थित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक को पत्र लिख कर इस मेम के बाग की ऐतिहासिकता बरकरार रखते हुए इस स्मारक को बचाने की मांग की थी व साथ में ही यह मांग भी की गई थी कि इस मेम के बाग को म्यूजियम बना दिया जाये!
आइये! अब चर्चा करते हैं इस ऐतिहासिक मेम के बाग की भू-माफिया के द्वारा गैर कानूनी तरीके से की गई खरीद फरोख्त के महाघोटाले की! वास्तव में इस महाघोटाले की शुरुआत दिनांक 14 जुलाई 1990 को होती है जब हिसार की एक कंपनी मै. ब्राइट स्टॉर डेवलपमेंट प्रा.लि.के मैनेजिंग डायरेक्टर विजय बंसल ने इस ऐतिहासिक धरोहर को खरीदने के लिए एक प्रारंभिक एग्रीमेंट किया! इस मामले में ब्राइट स्टॉर कंपनी के एमडी विजय बंसल ने इस ऐतिहासिक धरोहर के मैनेजर जसवंत सिंह जैन के बेटे बी.के.जैन के माध्यम से जे.आर.स्कीनर से मुलाकात की! इस ऐतिहासिक बाग के खसरा न.1038 की 104 कनाल 13 मरला जमीन में से 8 एकड़ 7 कनाल 19 मरला जमीन का सौदा 3 करोड़ 4 लाख 71 हजार रूपये में किया गया और पचास लाख रूपये ब्याने के तौर पर दिये गये! इस के बाद इस ऐतिहासिक बाग की इस जमीन का फाइनल एग्रीमेंट 9 नवंबर 1990 को किया गया और यह एग्रीमेंट जे.आर.स्कीनर ने अपने तौर पर व एल्बर्ट स्कीनर, सी.एच.स्कीनर, डग्लस स्कीनर और मिसेज सलीविया ए.महेन्द्रू की तरफ से जीपीए के तौर पर, ले.कर्नल एम.ए.आर.स्कीनर ने स्वयं के तौर पर और मिसेज लिलियन ई.सले के जीपीए के तौर पर और जसवंत सिंह जैन ने मिसेज के. एम. चुनिंगटो के जीपीए के तौर पर इस 8 एकड़ 7 कनाल 19 मरला जमीन के लिए किया गया! इस के बाद स्कीनर परिवार के जे.आर.स्कीनर व ब्राइट स्टॉर कंपनी के एमडी विजय बंसल के बीच इस सारी जमीन की कन्वेंस डीड करवाने के मामले में कुछ विवाद हो गया और इस के बाद वर्ष 1991 में विजय बंसल ने यह जमीन बगैर कन्वेंस डीड बने ही आगे लोगों को बेचनी शुरू कर दी!
दिनांक 3 दिसंबर 1991 को हिसार की सिविल कोर्ट में एल.के.अग्रवाल एडवोकेट के द्वारा इस ऐतिहासिक बाग की इस जमीन को बेचने के लिए किये जा रहे घोटाले के खिलाफ दावा दायर कर दिया! इस के बाद जे.आर.स्कीनर ने हिसार एसएसपी को दिनांक 24 दिसंबर 1991 को इस मामले की शिकायत की और हिसार के एसएसपी के द्वारा इस मामले में एक एफआईआर न.15 दिनांक 11 जनवरी 1992 को हिसार सिविल लाईन थाने में विजय कुमार बंसल व उनके वकील एल.आर. गोयल एडवोकेट, रामधारी निवासी सातरोड व उनके वकील एल.सी.अग्रवाल और अन्यों के खिलाफ आईपीसी की धारा 464, 465, 468, 469, 461, 467, 474, 120बी व 109 के तहत दर्ज करवाई गई!
दिनांक 30 अप्रैल 1992 को हिसार की सिविल कोर्ट ने इस जमीन की बिक्री पर स्टे कर दिया व हिसार के सब रजिस्ट्रार को इस खसरा न.1038 की जमीन की रजिस्ट्री नहीं किये जाने के आदेश का पत्र भेज दिया गया! मार्च 1992 में इसी जमीन को अधिग्रहित करने के लिए सरकार के द्वारा सेक्शन 4 की कार्यवाही भी कर दी गई!
दिनांक 19 मार्च 1992 को हरियाणा सरकार के द्वारा सेक्शन 4 के तहत इस ऐतिहासिक धरोहर का जो अधिग्रहण किया गया उस के खिलाफ जेम्स आर स्कीनर व स्कीनर परिवार के अन्य सदस्यों के द्वारा हरियाणा पंजाब हाईकोर्ट में वर्ष 1995 में एक रिट पिटीशन सीडब्लूपी न.3302 दायर की गई जिस का फैसला दिनांक 9 मार्च 2010 को दिया गया! इस ऐतिहासिक बाग की जमीन के खसरा न.1038 की जमीन पर मिल्ट्री ऑफिसर्स की मैस के लिए 17 कमरे बने हुए थे और यह खसरा न.1038 की जमीन बहुत ही ऐतिहासिक थी! हाईकोर्ट के इस फैसले के पेज न.3 पर स्पष्ट तौर पर वर्णित है कि खसरा न.1038 पर बनी हुई इमारत एक ऐतिहासिक स्मारक है और अधिग्रहण के तहत यह ऐतिहासिक स्मारक नष्ट नहीं किया जा सकता! इस ऐतिहासिक स्मारक के साथ एक कब्रिस्तान भी बना हुआ है! हरियाणा पंजाब हाईकोर्ट के दिनांक 9 मार्च 2010 के इस फैसले में इस ऐतिहासिक मेम के बाग की जमीन अधिग्रहण से मुक्त कर दी गई व वापिस स्कीनर परिवार के पास आ गई!

हांसी के इस ऐतिहासिक बाग मेम के बाग की जमीन की गैर कानूनी तौर पर खरीद बिक्री का असली खेल इस के बाद भू-माफिया के द्वारा शुरू किया गया! हांसी के इस ऐतिहासिक बाग के कुछ हिस्से को 29 जून व 30 जून वर्ष 2010 को कांग्रेस के हांसी के तत्कालीन विधायक विनोद भ्याना के भाई नरेंद्र भ्याना ने खरीद कर इस हिस्से की रजिस्ट्री करवाई! हांसी के कांग्रेस के तत्कालीन विधायक विनोद भ्याना के भाई नरेंद्र भ्याना की कंपनी ….दी हिसार कॉपरेटिव हॉउस बिल्डिंग सोसायटी लि.(हिसार) के द्वारा इस जमीन की करवाई गई चारों रजिस्ट्रियों में क्रेता के तौर पर विधायक विनोद भ्याना के भाई नरेंद्र भ्याना पेश हुए थे! नरेंद्र भ्याना को इन रजिस्ट्रियों में इस फर्म का सदस्य बताया गया है! इसके बाद वर्ष 2019 के चुनाव से पहले ही विनोद भ्याना ने भाजपा पार्टी की सदस्यता ग्रहण की व हांसी से ही भाजपा की टिकट ले कर चुनाव लड़ा व अब वर्तमान में भाजपा के विधायक बन गये! वर्ष 2019 में भाजपा के विधायक बनते ही विनोद भ्याना के इशारे पर ही इस ऐतिहासिक बाग का ऐतिहासिक गेट तोड़ कर नष्ट कर दिया गया! हांसी के इस ऐतिहासिक बाग मेम के बाग की जमीन की खरीद बिक्री का यह महाघोटाला साबित करता है कि वर्तमान की भाजपा सरकार ने भी भू-माफिया के साथ मिल कर हांसी की इस ऐतिहासिक धरोहर को नष्ट करने में पूरा-पूरा सहयोग दिया है!



