प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम 1857 क्रांतिकारी आन्दोलन के महानायक थे अमर बलिदानी मंगल पांडे : पंडित रविकांत शर्मा

दिल्ली : रानी लक्ष्मीबाई केसरिया माधव संस्थान के तत्वाधान में विक्टोरिया बैंकट हॉल कोटला विहार दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि शामिल हुए विश्व ब्राह्मण संघ (भारत) एवं रानी लक्ष्मीबाई केसरिया माधव संस्थान के चेयरमेन पंडित रविकांत शर्मा ने अमर बलिदानी मंगल पांडे जी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वल कर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की! भारत माता की — जय! वन्दे — मातरम! के जय घोष से संपूर्ण हॉल गुंजायमान हो उठा जबकि कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ राष्ट्रीय सदस्यता अभियान प्रभारी पंडित रंगनाथ तिवारी ने किया! अध्यक्षता राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद कुमार द्विवेदी ने की! मुख्य अतिथि चेयरमेन पंडित रविकांत शर्मा ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि मंचासीन सम्मानित अतिथिगण, ‘रानी लक्ष्मीबाई केसरिया माधव संस्थान’ के सभी कर्मठ पदाधिकारी और उपस्थित मेरे सभी राष्ट्रभक्त भाईयों और बहनों !

8 अप्रैल के दिन, वर्ष 1857 में, भारत की स्वाधीनता का पहला शंखनाद करने वाले अमर बलिदानी, क्रांतिवीर मंगल पांडे जी ने हँसते-हँसते फांसी का फंदा चूमा था। आज हम उनके ‘बलिदान दिवस’ पर उस महान आत्मा को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के लिए एकत्रित हुए हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और धर्म की रक्षा
साथियों, हमारी भारत भूमि हमेशा से वीरों, तपस्वियों और धर्म-रक्षकों की जननी रही है। इसी पावन धरा पर, उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा ग्राम में वीर मंगल पांडे जी का जन्म हुआ था। युवावस्था में ही वे सेना में भर्ती हो गए। वह दौर ब्रिटिश गुलामी का था, लेकिन भारतीय सैनिकों के सीनों में स्वाधीनता की आग भीतर ही भीतर सुलग रही थी।
अंग्रेज केवल हम पर राज ही नहीं कर रहे थे, बल्कि वे हमारी आस्था, हमारे धर्म और हमारी संस्कृति को कुचलने का नीच षड्यंत्र भी रच रहे थे। जब बैरकपुर की 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री में यह खबर फैली कि सैनिकों को दिए जाने वाले नए एनफील्ड कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी मिली हुई है, जिन्हें मुंह से काटना पड़ता है, तो सैनिकों का खून खौल उठा।
एक सच्चे देशभक्त और धर्म निष्ठा ब्राह्मण होने के नाते, मंगल पांडे जी को यह घोर अधर्म स्वीकार नहीं था। यह केवल एक सैनिक विद्रोह नहीं था; यह हमारे ‘धर्म’ और ‘राष्ट्र’ के स्वाभिमान की रक्षा का परम युद्ध था। 29 मार्च 1857 को उन्होंने छावनी में विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया और अपने साथियों को ललकारते हुए कहा— “अंग्रेज हमारे धर्म को भ्रष्ट कर रहे हैं, हमें गुलामी की यह बेड़ी तोड़ देनी चाहिए!”
वीरता का अद्भुत प्रदर्शन और शहादत
जब अंग्रेज अधिकारी— सार्जेंट मेजर ह्यूसन और लेफ्टिनेंट बाघ (Baugh)— उन्हें गिरफ्तार करने के लिए आगे बढ़े, तो मंगल पांडे की बंदूक और म्यान से निकली तलवार ने ब्रिटिश हुकूमत पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने अकेले ही उन अंग्रेज अधिकारियों को धूल चटा दी और उन्हें अपनी तलवार से गंभीर रूप से घायल कर दिया। उनके शौर्य का प्रताप ऐसा था कि पूरी भारतीय पलटन ने कर्नल के आदेश के बावजूद अपने इस नायक को छूने से भी साफ इनकार कर दिया।
जब मंगल पांडे ने देखा कि भारी अंग्रेजी फौजों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया है, तो इस वीर सपूत ने अंग्रेजों के नापाक हाथों से मरने के बजाय अपनी ही बंदूक से खुद का बलिदान देना उचित समझा। उन्होंने खुद को गोली मार ली। दुर्भाग्य से वे वीरगति को प्राप्त नहीं हुए और घायल अवस्था में उन्हें बंदी बना लिया गया।
अदालत में सिंह गर्जना और फाँसी
मुकदमे के दौरान, जब अंग्रेज न्यायाधीश ने उनसे सवाल किए, तो उनका सीना गर्व से तना हुआ था। उन्होंने निर्भीकता से जो कहा, वह आज भी हर भारतीय का माथा ऊँचा कर देता है। उन्होंने कहा— “मैं अंग्रेजों को अपने देश का भाग्यविधाता नहीं मानता। अपने धर्म की रक्षा करना और देश को आजाद कराना यदि अपराध है, तो मैं हर दण्ड भुगतने को तैयार हूँ।”
अंग्रेज मंगल पांडे के इस तेज से इतना खौफ खा गए थे कि पूरे देश में क्रांति फैलने के डर से, फांसी की तय तारीख 18 अप्रैल से दस दिन पहले ही… यानी 8 अप्रैल 1857 को, घायल अवस्था में ही उन्हें गुपचुप तरीके से फांसी पर लटका दिया। आप उनके प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि बैरकपुर छावनी का कोई भी स्थानीय व्यक्ति उन्हें फांसी देने के लिए तैयार नहीं हुआ, अंग्रेजों को कलकत्ता से जल्लाद बुलाने पड़े थे।
मेरे भाईयों और बहनों! आज हम ‘रानी लक्ष्मीबाई केसरिया माधव संस्थान’ के प्रांगण में बैठे हैं। अमर बलिदानी मंगल पांडे जी ने बैरकपुर में क्रांति की जो पहली चिंगारी भड़ काई थी, उसी चिंगारी को आगे चलकर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई चंद्रशेखर आजाद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल तात्या टोपे सुभाष चंद्र बोस सहित ने एक दावानल का रूप दिया और अंग्रेजों की जड़ें जलाकर राख कर दीं। ब्राह्मण कुल में जन्मे महापुरुषों ने— चाहे वे मंगल पांडे हों या मणिकर्णिका (रानी लक्ष्मीबाई)— मातृभूमि और धर्म के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
विश्व ब्राह्मण संघ (भारत) उस महान बलिदानी को नमन कर: क्रांतिवीर मंगल पांडे — अमर रहें, अमर रहें! भारत माता की — जय! वन्दे — मातरम!

कार्यक्रम के समापन से पूर्व मुख्य अतिथि चेयरमेन पंडित रविकांत शर्मा राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद कुमार द्विवेदी एवं राष्ट्रीय प्रभारी रंग नाथ तिवारी ने राष्ट्रीय संरक्षक पंडित सोमदत्त राष्ट्रीय सचिव पंडित गोपाल शर्मा अध्यक्ष विशाल अरोड़ा अध्यक्ष जय हिंद मंच सुरेश चंद शर्मा पूर्व डायरेक्टर गृह मंत्रालय चित्र लेखा पंडित कुलदीप शर्मा संजय कौशिक पंडित राधेश्याम हरवेली नरेंद्र शर्मा सचिन गोयल कवि ज्योति उपाध्याय सहित अन्य लोगों को मंच पर पटका पहनाकर एवं रानी लक्ष्मीबाई केसरिया माधव संस्थान का प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में गणमान्य लोग एवं महिलाएं शामिल रही।देश के कई प्रसिद्ध कवियों ने आज़ादी के ऊपर रचनायें पढ़ी।



