गीले सूखे कूड़े की है अजीबोगरीब कहानी

गुरुग्राम (मदन लाहौरिया) 3 जनवरी। गुरुग्राम में आजकल हर दिन गीले सूखे कूड़े की चर्चा जोरों पर चलती रहती है! इस गीले सूखे कूड़े को अलग अलग करने के सरकारी अभियान का ठेका कई एनजीओ ने ले लिया है!गुरुग्राम की जनता एक बात यह समझ में नहीं आ रही कि यहां की सडक़ों पर तो गीले सूखे कूड़े के मिक्स ढेर लगे रहते हैं और नगर निगम व ईको ग्रीन के कूड़ा उठाने वाले वाहन कई कई दिन कूड़ा उठाने ही नहीं आते व यह गीला तथा सूखा कूड़ा मिक्स रूप में ही सड़ता रहता है तो फिर जनता पर क्यों दबाव बनाया जा रहा है कि हर घर में गीला सूखा कूड़े के लिए डस्टबिन अलग अलग रखे! लोगों का कहना है कि गुरुग्राम में हर दिन कहीं न कहीं और किसी न किसी सडक़ पर खुले में ही भंडारे लगते रहते हैं! उन भंडारों में खाना खा कर लोग प्लास्टिक व थर्मोकोल की प्लेटें व दोने वहीँ सडक़ों पर फेंक जाते हैं व साथ में ही बहुत से लोग भंडारे की सब्जियों से भरी पोलोथिन की थैली सडक़ों पर ही फेंक जाते हैं! सडक़ों पर डाला हुआ यह कचरा गीला और सूखा व प्लास्टिक तथा पोलोथिन का मिक्स होता है जो कि पर्यावरण के लिए बहुत नुकसानदायक है! जब सडक़ों पर डाले गये भंडारों के इस कूड़े को अलग-अलग करने की भंडारा लगाने वालों की कोई जिम्मेवारी तय नहीं की गई तो फिर रिहायशी कालोनियों में रहने वाले मध्यम व गरीब वर्ग के लोग गीले व सूखे कूड़े को अलग अलग रखने के झंझट में क्यों फंसे?

इस देश में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो उनके समय में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार के द्वारा 25 सितंबर 2000 को एक नोटिफिकेशन के माध्यम से म्युनिस्पल सॉलिड वेस्ट मैनेजमैंट व हैंडलिंग रूल्स 2000 जारी किया जिस में रूल 4 के तहत म्युनिस्पल अथॉर्टी की जिम्मेवारी के कॉलम के एक नंबर पर स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि हरेक म्युनिस्पल अथॉर्टी की म्युनिस्पल सॉलिड वेस्ट को घरों से लेने,संग्रहण करने,अलग अलग करने ट्रान्सपोर्टेशन,प्रोसेसिंग व डिस्पोजल की जिम्मेवारी है! इसके बाद वर्ष 2016 में जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे तो उन्होंने अटल जी के द्वारा बनाये गए इस रूल को बदल कर स्वच्छ भारत मिशन के तहत म्युनिस्पल सॉलिड वेस्ट मैनेजमैंट रूल्स 2016 के क्लॉज 4.1 के तहत हरेक कूड़ा जनरेट करने वालों की ड्यूटी के तहत कूड़े को अलग अलग करना जरूरी किया जब कि एमएसडब्लू रूल्स 2000 के तहत यह जिम्मेवारी नगर निगम की थी परंतु गुरुग्राम में ईको ग्रीन कंपनी से किये गये एग्रीमेंट के रिव्यू में हरियाणा सरकार ने एग्रीमेंट की शर्तों में बदलाव करते हुए सूखा कूड़ा हर सेक्टर के घरों से उठाने के लिए कूड़े की सेग्रिगेशन पॉलिसी में बदलाव किया!

वास्तव में तो गुरुग्राम में सफाई व्यवस्था की बुरी हालात को देखते हुए तो आम साधारण जनता को यह लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी स्वच्छ भारत मिशन के नाम पर प्रचार करते हुए खरबों रूपये खर्च कर गये परंतु जमीनी स्तर पर सफाई व्यवस्था में सुधार कहीं पर नहीं हुआ! गुरुग्राम के बंधवाड़ी में लगे 35 लाख टन कूड़े के पहाड़ से उपजी समस्या की खबर हमारे न्यूज पोर्टल पर लगाई गई तो उस में जनहित में जनता की भावनाओं को देखते हुए मोदी जी के द्वारा कुंभ के मेले में पांच सफाई कर्मचारियों के पैर धोने का जो राजनैतिक ड्रामा किया था उसके बारे में खबर में लिखा गया था कि पैर धोने वाले व पैर धुलवाने वाले दोनों ही निम्न जाति से हैं! यह कटु सत्य है! इसके बारे में हम आज दोबारा बता देते हैं कि जब कोई बात जनहित में जातिगत भी सत्य लिखी जाती है तो वह दुर्भावना से नहीं होती और सविंधान के खिलाफ नहीं होती! गुरुग्राम में सफाई व्यवस्था को सुधारने के लिए तो व्यवहारिक योजना ही देनी होगी! जितने भी कूड़ा संग्रहण केंद्र है उन पर ही गीला व सूखा कूड़े के लिए अलग अलग बड़े कंटेनर रखे जायें ताकि घरों का अलग अलग कूड़ा उन में डाला जा सके! कूड़े के डस्टबिन व कंटेनर प्लास्टिक के नहीं होने चाहिये क्यों कि प्लास्टिक के डस्टबिनों की सडक़ों पर टूटने के बाद जर्जर हालत हो जाती है व कूड़ा बाहर फैला रहता है! गीले और सूखे कूड़े की इस अजीबोगरीब दास्तान को देखते हुए गुरुग्राम का प्रशासन जनहित में सफाई व्यवस्था को सुचारु रूप से लागू करते हुए जनता को गीले सूखे के चक्कर में ना फसायें!

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