एसीएफआई ने फसल सुरक्षा उद्योग को मजबूत करने के लिए 5,000-7,500 करोड़ रुपये की समर्पित योजना की मांग की

नई दिल्ली, 19 सितंबर : एग्रोकेमिकल उद्योग के शीर्ष संगठनएग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसीएफआई)ने सरकार से क्षेत्र के लिए लक्षित और समयबद्ध नीति ढांचा लागू करने का आग्रह किया है। संगठन ने अपस्ट्रीम विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए अनुमानित 5,000-7,500 करोड़ रुपये के सहायता कार्यक्रमकी मांग की है, ताकि एग्रोकेमिकल टेक्निकल्स और इंटरमीडिएट्स के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके, उपयोगिता लागत के मामले में चीन के लाभ को कम किया जा सके और बैकवर्ड इंटीग्रेशन को बढ़ावा दिया जा सके।

एसीएफआई और वैश्विक परामर्श कंपनीकेपीएमजीने संयुक्त रूप से “रीडिफाइनिंग इंडियन क्रॉप प्रोटेक्शन थ्रू इनोवेशन: फ्रॉम स्केल टू साइंस” शीर्षक से एक नॉलेज पेपर जारी किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि औद्योगिक नीति का उद्देश्य स्थायी संरक्षण या सब्सिडी पर निर्भरता नहीं होना चाहिए, बल्कि उन स्पष्ट रूप से पहचानी गई कमियों को दूर करना होना चाहिए, जो वैश्विक कंपनियों की तुलना में भारतीय विनिर्माण की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को प्रभावित करती हैं।

एसीएफआई के चेयरमैन राहुल धनुकाने कहा, “हमारा ध्यान किसानों की वास्तविक जरूरतों पर होना चाहिए। इसके लिए सक्षम नियामक ढांचे के माध्यम से नवाचार को बढ़ावा देना, घरेलू क्षमताओं और मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करना, डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना और टिकाऊ कृषि को आगे बढ़ाना जरूरी है। अंततः नवाचार की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन प्रयासों को किसानों के लिए कितनी प्रभावी, सुलभ और भरोसेमंद समाधानों में बदला जा सकता है।”

एसीएफआई-केपीएमजी रिपोर्ट मेंसात से आठ वर्ष की सहायता अवधिकी सिफारिश की गई है। इसमें संयंत्र स्थापित करने और शुरू करने के लिए दो से तीन वर्ष तथा उसके बाद निरंतर उत्पादन सहायता का प्रावधान हो। प्रस्तावित ढांचे में बड़े उद्योगों के साथ-साथ एमएसएमई को भी शामिल करने के लिए निवेश की अलग-अलग श्रेणियां होनी चाहिए। यह ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड दोनों तरह के विस्तार पर लागू हो।

रिपोर्ट में पीएलआई की तर्ज पर अतिरिक्त बिक्री पर आधारित प्रोत्साहन, बिजली और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी उपयोगिता लागत पर सब्सिडी तथा विशेष अनुसंधान एवं विकास के लिए पूंजीगत अनुदान की भी सिफारिश की गई है।

रिपोर्ट में चीन के परिचालन व्यय (OPEX) संबंधी लाभ का मुकाबला करने के लिएअतिरिक्त बिक्री पर 5-8 प्रतिशत प्रोत्साहन, औद्योगिक बिजली पर 30-40 प्रतिशत सब्सिडीऔर साझाकॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) के उपयोग पर सब्सिडी का सुझाव दिया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है, “फसल सुरक्षा क्षेत्र में भारत के विकास के अगले चरण की नींव इकोसिस्टम की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत करने, नवाचार के व्यावसायीकरण में तेजी लाने, आपूर्ति श्रृंखला को अधिक मजबूत बनाने और संरचनात्मक लागत संबंधी नुकसान को कम करने पर आधारित होनी चाहिए।”

रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशों में साझा उपयोगिताओं से युक्त विशेष एग्रोकेमिकल मैन्युफैक्चरिंग पार्क, क्लस्टर आधारित पर्यावरणीय बुनियादी ढांचा, दीर्घकालिक वित्तपोषण और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इंटरमीडिएट्स में चयनित बैकवर्ड इंटीग्रेशन शामिल हैं।

रिपोर्ट में केंद्र और राज्य स्तर की मंजूरियों के लिए एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथसिंगल-विंडो नियामक व्यवस्था, पारदर्शी और समयबद्ध प्रक्रियाओं तथा जैविक फसल सुरक्षा उत्पादों के लिए स्पष्ट नियामक व्यवस्था की भी मांग की गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के विकास के अगले चरण की निर्भरता केवल विनिर्माण क्षमता बढ़ाने पर नहीं हो सकती। प्रोसेस केमिस्ट्री, फॉर्मुलेशन, टेक्निकल मैन्युफैक्चरिंग और नियामक प्रक्रियाओं के क्षेत्र में भारत की मजबूत स्थिति के बावजूद देश को उत्पाद विकास, बायोलॉजिकल्स, उन्नत फॉर्मुलेशन, रेगुलेटरी साइंस और डिजिटल कृषि के क्षेत्र में अपनी क्षमताओं को मजबूत करने की जरूरत है।

रिपोर्ट नेजैविक फसल सुरक्षा (Biological Crop Protection) को भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर बताया है। इसमें भारत की जैव विविधता, कृषि आधार, फर्मेंटेशन विशेषज्ञता और वैज्ञानिक प्रतिभा को प्रमुख ताकत के रूप में रेखांकित किया गया है। हालांकि, रिपोर्ट ने आगाह किया कि इसका व्यावसायीकरण बैच की गुणवत्ता में एकरूपता, फॉर्मुलेशन की स्थिरता, बड़े पैमाने पर उत्पादन, विभिन्न स्थानों पर फील्ड वैलिडेशन और किसानों द्वारा इसे अपनाने पर निर्भर करेगा।

रिपोर्ट में अनुसंधान और व्यावसायिक उपयोग के बीच की दूरी कम करने के लिए पायलट-स्केल सुविधाओं, फील्ड वैलिडेशन नेटवर्क, GLP प्रयोगशालाओं, अवशेष परीक्षण बुनियादी ढांचे और फॉर्मुलेशन विकास प्लेटफॉर्म को मजबूत करने की सिफारिश की गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की भविष्य की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता तेजी से इस बात पर निर्भर करेगी कि देश वैश्विक बाजारों के लिए अलग पहचान वाले फसल सुरक्षा समाधानों को विकसित, पंजीकृत, निर्मित और व्यावसायिक रूप से उपलब्ध कराने में कितना सक्षम होता है।

भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी फसल सुरक्षा इकोसिस्टम के रूप में स्थापित करने के लिए सरकार, उद्योग, अनुसंधान संस्थानों, निवेशकों और किसानों के बीच समन्वित प्रयास की आवश्यकता होगी।

रिपोर्ट में कहा गया है, “नीतिगत सहायता अनुकूल परिस्थितियां तैयार कर सकती है, लेकिन दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि विभिन्न हितधारक विनिर्माण, नवाचार, व्यावसायीकरण और बाजार तक पहुंच को मजबूत करने के लिए कितनी प्रभावी ढंग से सहयोग करते हैं।”

भारत का एग्रोकेमिकल उद्योग पहले ही खुद को वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित कर चुका है। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि फसल सुरक्षा का भविष्य तेजी से नवाचार, टिकाऊ कृषि, प्रिसीजन एग्रीकल्चर, जैविक समाधान और एकीकृत फसल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों से प्रभावित हो रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है, “सफलता केवल उत्पादों को कुशलतापूर्वक बनाने की क्षमता पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि वैश्विक बाजारों के लिए अलग पहचान वाले समाधानों को विकसित करने, पंजीकृत करने, व्यावसायीकरण करने और बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराने की क्षमता पर भी निर्भर करेगी।”

नवाचार और कृषि के भविष्य पर विशेषज्ञों ने रखे विचार
एजीएम के बाद एसीएफआई ने“द इनविजिबल रिवोल्यूशन: हाउ इनोवेशन इज फीडिंग इंडिया”विषय पर एक पैनल चर्चा का भी आयोजन किया। इसमें सरकार, उद्योग और शिक्षा जगत के प्रमुख विशेषज्ञों ने एग्रोकेमिकल उद्योग में हो रहे नवाचार और सामने आ रही चुनौतियों पर विचार साझा किए।

भारत सरकार के प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. विशाल चौधरीने कहा, “भारत ने एग्रोकेमिकल विनिर्माण के क्षेत्र में पहले ही मजबूत स्थिति बना ली है। अब अगला कदम इस विनिर्माण क्षमता के साथ अनुसंधान, नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास पर अधिक ध्यान देना है। इसके लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी और अनुसंधान संस्थानों, शिक्षा जगत तथा उद्योग के बीच संरचित सहयोग को मजबूत करना होगा।”

डॉ. स्वीटी बेहरा, निदेशक, एफएसएसएआईने कहा, “कृषि में नवाचार का पारंपरिक जोर उत्पादकता बढ़ाने पर रहा है, लेकिन अब वैज्ञानिक प्रगति के लिए टिकाऊपन और उपभोक्ता सुरक्षा को भी समान प्राथमिकता देना जरूरी है। इसलिए नियामक फैसले ठोस वैज्ञानिक प्रमाण, जोखिम आधारित दृष्टिकोण और प्रभावी निगरानी पर आधारित होने चाहिए। नवाचार और नियमन को एक-दूसरे का पूरक होना चाहिए।”

डॉ. काव्या दशोरा, प्रोफेसर, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्लीने कहा, “नैनो टेक्नोलॉजी लक्षित डिलीवरी, नियंत्रित रिलीज और इनपुट के कम इस्तेमाल के जरिए फसल सुरक्षा को बेहतर बना सकती है। हालांकि, खेतों में इसके इस्तेमाल के दौरान नैनोकणों के व्यवहार, उनके बने रहने और विषाक्तता से जुड़ी चुनौतियां सामने आती हैं। इसके व्यापक उपयोग के लिए बेहतर डेटा, ट्रैकिंग व्यवस्था और ‘सेफ-बाय-डिजाइन’ नैनो सामग्री की आवश्यकता है, ताकि पर्यावरण और उपभोक्ता सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।”

पुष्पलता सिंह, निदेशक, टेरीने कहा, “जैव प्रौद्योगिकी और नैनो टेक्नोलॉजी भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ और जलवायु के प्रति सक्षम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। ‘सेफ-बाय-डिजाइन’ दृष्टिकोण, जिसमें नैनोपेस्टिसाइड बनाने के लिए जैव-आधारित सामग्री का इस्तेमाल शामिल है, पौधों, मनुष्यों और पर्यावरण के लिए जैव-संगतता और सुरक्षा को बेहतर बना सकता है। जैव प्रौद्योगिकी और नैनो टेक्नोलॉजी मिलकर अधिक सटीक इनपुट उपयोग में मदद कर सकती हैं और बढ़ते जलवायु एवं संसाधन संबंधी दबावों के बीच कृषि को सक्षम बना सकती हैं।”

डॉ. राजवीर राठी, निदेशक-एग्रीकल्चरल अफेयर्स, बायर क्रॉपसाइंसने कहा, “प्रभावी टेक्नोलॉजी लाइसेंसिंग और एक्सेसफ्रेमवर्क कृषि नवाचार और भारतीय किसानों द्वारा इसके इस्तेमाल के बीच की दूरी कम करने में मदद कर सकते हैं। इससे प्रमाणित तकनीकों को व्यापक और किफायती तरीके से उपलब्ध कराया जा सकेगा।”

श्रीनिवास करावाड़ी, संस्थापक एवं सीईओ, क्षेत्रज्ञ फार्म सॉल्यूशंसने कहा, “भारतीय कृषि का भविष्य फसल सुरक्षा, बायोलॉजिकल्स, फसल पोषण, बीज और डिजिटल तकनीकों को अलग-अलग विकसित करने के बजाय उन्हें एक साथ जोड़ने में है। पोषक तत्वों के बेहतर उपयोग, मिट्टी के स्वास्थ्य की बहाली और तनाव सहने वाली किस्मों के विकास से कम पर्यावरणीय और संसाधन लागत में अधिक उत्पादकता हासिल करने में मदद मिलेगी। डिजिटल टूल्स, एआई और जमीनी स्तर पर मजबूत क्षमताएं सलाह को मानकीकृत करने और तेजी से जटिल होते बाजार में किसानों को बेहतर निर्णय लेने में मदद कर सकती हैं।”

गोपी नाथ कोनेटी, पार्टनर एवं सीनियर एडवाइजर, केपीएमजी इंडियाने कहा, “कृषि नवाचार को अंततः आर्थिक व्यवहार्यता की कसौटी पर खरा उतरना होगा, क्योंकि किसान ऐसे समाधानों को महत्व देते हैं जिनका लाभ स्पष्ट, मापने योग्य और सबसे महत्वपूर्ण रूप से लाभदायक हो। इसलिए नवाचार का मूल्यांकन केवल उसके वैज्ञानिक महत्व के आधार पर नहीं, बल्कि उसके व्यावहारिक प्रभाव, लागत और किसान को मिलने वाले रिटर्न के आधार पर भी होना चाहिए। भारतीय कृषि में निवेश किए जाने वाले प्रत्येक रुपये के महत्व को देखते हुए विज्ञान और अर्थशास्त्र को साथ-साथ चलना होगा, ताकि नवाचार बड़े पैमाने पर सार्थक परिणाम दे सकें।”

प्रभुदत्त, डिप्टी एडिटर, हिंदू बिजनेसलाइनने कहा, “उद्योग को यह अनुमान लगाना होगा कि अगले दशक में उपभोक्ताओं की प्राथमिकताएं और खेती के तरीके किस तरह बदल सकते हैं और उसी के अनुरूप समाधान विकसित करने होंगे। जब किसानों को स्पष्ट लाभ दिखाई देता है तो वे नई तकनीकों को अपनाने के लिए तैयार रहते हैं। हालांकि, कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उत्पाद भरोसेमंद हों, जिम्मेदारी से विकसित किए गए हों और किसानों के हितों या मिट्टी के स्वास्थ्य से समझौता न करें। किसानों का दीर्घकालिक भरोसा कायम करना महत्वपूर्ण है।”

डॉ. कल्याण गोस्वामी, महानिदेशक, एसीएफआईने कहा, “कृषि में नवाचार अलग-अलग क्षेत्रों में अकेले सफल नहीं हो सकता। जैव प्रौद्योगिकी, फसल सुरक्षा, बायोलॉजिकल्स, नैनो टेक्नोलॉजी, डिजिटल तकनीक, बेहतर बीज और फसल पोषण को एक साथ लाकर ऐसे समाधान विकसित करने होंगे जो वैज्ञानिक रूप से मजबूत, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और किसानों के लिए उपयोगी हों। किसानों का भरोसा कायम करना और उसे बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एक संगठन के रूप में हम उद्योग, शिक्षा जगत, सरकार और वैज्ञानिक समुदाय को एक मंच पर लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, ताकि ऐसा इकोसिस्टम तैयार किया जा सके जहां नवाचार अनुसंधान से निकलकर खेत तक पहुंचे और अंततः भारतीय किसान को लाभ पहुंचाए।”

एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया के बारे में
एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया (ACFI) एक शीर्ष उद्योग संगठन है, जो पूरे भारत में भारतीय एग्रोकेमिकल उद्योग के 85 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।एसीएफआई ने कई शैक्षणिक संस्थानों, किसान संगठनों तथा सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों के साथ साझेदारी की है।

एसीएफआई किसानों के हित में काम करता है और उन्हेंपौध संरक्षण रसायनों (कीटनाशकों)के सही उपयोग के बारे में जागरूक करता है, ताकि विभिन्न फसलों में अधिक उपज और बेहतर गुणवत्ता वाली कृषि उपज हासिल की जा सके। इसके तहत किसानों कोसही मात्रा, समय पर एवं उचित तरीके से उपयोग और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPEs) के इस्तेमाल के बारे में जानकारी दी जाती है।

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