संत की संगत और समागम का श्रवण व्यक्ति का जीवन बदल सकता : आनंदमूर्ति गुरूमां

चार दिवस ज्ञान, भक्ति, योग की अमृतवर्षा समागम का हुआ समापन

फरीदाबाद : संत की संगत और समागम का श्रवण व्यक्ति का जीवन बदल सकता है। संत का दरबार ईश्वर का द्वार होता है,जहां अहंकार से नहीं विनम्रता से संत के मार्गदर्शन में जीवन की परिस्थितियों को बदला जा सकता है, क्योंकि संत ही प्रभु से जोडऩे का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। इसलिए गुरू का स्थान ईश्वर से ऊपर माना गया है। यह बात एनआईटी स्थित दशहरा ग्राउंड में ऋषि चैतन्य विजन फरीदाबाद द्वारा आयोजित ज्ञान, भक्ति, योग की अमृतवर्षा समागम के चौथे अंतिम दिन परमपूज्य आनंदमूर्ति गुरूमां ने भक्तो से खचाखच भरे पंडाल में समागम को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि व्यक्ति माटी का पुतला है जिसे आखिर में मिट्टी में ही मिल जाना है। मिट्टी में मिलने से पूर्व उसे ज्ञान की धारा से जुडऩा सत्संग और समागम का हिस्सा बनना और दूसरों को राह दिखाना ही सार्थक जीवन कहलात है।

आशीर्वाद पर बोलते हुए गुरूमां ने कहा कि अधिकतर लोग संतों से आशीर्वाद की अपेक्षा करते हैं जोकि गलत है। जीवन में कर्म प्रधान है जब तक कर्म नहीं किया जाएगा आशीर्वाद कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि संत हमेशा अज्ञान का पर्दा उठाकर ज्ञान की ओर जोड़ता है और ज्ञान के द्वारा ही प्रभु की भक्ति में मन लगाने के लिए प्रेरित करता है तब कर्म जाकर आशीर्वाद का रूप लेता है। ऐसे में हम आत्मस्वरूप का बोध करते हैं और मन बहुत आनंदित होता है यही व्यक्ति की सिद्धि है। मन को एकाग्र करना परमात्मा से प्रीत बढ़ाना उसके प्रेम में मस्ती में झुमना या गाने पर जो आनंद की अनुभुति होती है वही सहज परमात्मा की भक्ति है हमें इससे जुडऩा चाहिए और यह सभी संतों के मार्ग दर्शन में ही संभव है। उन्होंने कहा कि भारत ऋषियों का देश है और ऋषियों ने वेदों में परमात्मा से मिलने का ज्ञान समाहित किया हमें उनके आदर्शों पर चलना चाहिए। आज लोग तत्काल लाभ के चक्कर में भ्रमित होकर शार्ट कट का रास्ता पकडऩे का प्रयास करते हैं, जिससे बाद में पछताना पड़ता है।

गुरूमां ने लोगों से कहा कि जीवन सफल बनाने के लिए मार्ग दर्शन की आवश्यकता होती है और यह मार्गदर्शन एक संत ही दिखा सकता है, क्योंकि संत या गुरू का शिष्य उसके पुत्र के समान होता है। भटका हुआ व्यक्ति जीवन में असफलता का मुहं देखता है। ज्ञान पाने के बावजूद भी ईश्वर की स्मृति नहीं की तो वह ज्ञान अज्ञान में बदल जाता है, क्योंकि गीता में श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं मैं सब में हूं और सब मुझ में है। उन्होंने कहा कि आज देश में लोग बिरादरी, जाति, प्रदेश से पहचान बताने का प्रयास करते हैं जबकि हमारी पहचान तो ईश्वर से है, क्योंकि हम उसी की संतान है। ईश्वर में हम और हम में ईश्वर है। इससे पूर्व बडखल विधानसभा के विधायक धनेश अदलक्खा, पूर्व महापौर सुमन बाला एवं ऋषि चैतन्य विजन के कार्यकर्ताओं ने पूज्य आनंदमूर्ति गुरूमां का पुष्प गुच्छ देकर स्वागत किया।

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